Wednesday, March 3, 2010

Lal Haweli


ताहिरा ने पास के बर्थ पर सोए अपने पति को देखा और एक लंबी साँस खींचकर करवट बदल ली।

कंबल से ढकी रहमान अली की ऊँची तोंद गाड़ी के झकोलों से रह-रहकर काँप रही थी। अभी तीन घंटे और थे। ताहिरा ने अपनी नाजुक कलाई में बँधी हीरे की जगमगाती घड़ी को कोसा, कमबख़्त कितनी देर में घंटी बजा रही थी। रात-भर एक आँख भी नहीं लगी थी उसकी।

पास के बर्थ में उसका पति और नीचे के बर्थ में उसकी बेटी सलमा दोनों नींद में बेखबर बेहोश पड़े थे। ताहिरा घबरा कर बैठ गई। क्यों आ गई थी वह पति के कहने में, सौ बहाने बना सकती थी! जो घाव समय और विस्मृति ने पूरा कर दिया था, उसी पर उसने स्वयं ही नश्तर रख दिया, अब भुगतने के सिवा और चारा ही क्या था!

स्टेशन आ ही गया था। ताहिरा ने काला रेशमी बुर्का खींच लिया। दामी सूटकेस, नए बिस्तरबंद, एयर बैग, चांदी की सुराही उतरवाकर रहमान अली ने हाथ पकड़कर ताहिरा को ऐसे सँभलकर अंदाज़ से उतारा जैसे वह काँच की गुड़िया हो, तनिक-सा धक्का लगने पर टूटकर बिखर जाएगी। सलमा पहले ही कूदकर उतर चुकी थी।
दूर से भागते, हाँफते हाथ में काली टोपी पकड़े एक नाटे से आदमी ने लपककर रहमान अली को गले से लगाया और गोद में लेकर हवा में उठा लिया। उन दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे। 'तो यही मामू बित्ते हैं।' ताहिरा ने मन ही मन सोचा और थे भी बित्ते ही भर के। बिटिया को देखकर मामू ने झट गले से लगा लिया, 'बिल्कुल इस्मत है, रहमान।' वे सलमा का माथा चूम-चूमकर कहे जा रहे थे, 'वही चेहरा मोहरा, वही नैन-नक्श। इस्मत नहीं रही तो खुदा ने दूसरी इस्मत भेज दी।'
ताहिरा पत्थर की-सी मूरत बनी चुप खड़ी थी। उसके दिल पर जो दहकते अंगारे दहक रहे थे उन्हें कौन देख सकता था? वही स्टेशन, वही कनेर का पेड़, पंद्रह साल में इस छोटे से स्टेशन को भी क्या कोई नहीं बदल सका!

'चलो बेटी।' मामू बोले, 'बाहर कार खड़ी है। जिला तो छोटा है, पर अल्ताफ की पहली पोस्टिंग यही हुई। इन्शाअल्ला अब कोई बड़ा शहर मिलेगा।'

मामू के इकलौते बेटे अल्ताफ की शादी में रहमान अली पाकिस्तान से आया था, अल्ताफ को पुलिस-कप्तान बनकर भी क्या इसी शहर में आना था। ताहिरा फिर मन-ही-मन कुढ़ी।

घर पहुँचे तो बूढ़ी नानी खुशी से पागल-सी हो गई। बार-बार रहमान अली को गले लगा कर चूमती थीं और सलमा को देखकर ताहिरा को देखना भूल गई, 'या अल्लाह, यह क्या तेरी कुदरत। इस्मत को ही फिर भेज दिया।' दोनों बहुएँ भी बोल उठीं, 'सच अम्मी जान, बिल्कुल इस्मत आपा हैं पर बहू का मुँह भी तो देखिए। लीजिए ये रही अशरफ़ी।' और झट अशरफ़ी थमा कर ननिया सास ने ताहिरा का बुर्का उतार दिया, 'अल्लाह, चाँद का टुकड़ा है, नन्हीं नजमा देखो सोने का दिया जला धरा है।'

ताहिरा ने लज्जा से सिर झुका लिया। पंद्रह साल में वह पहली बार ससुराल आई थी। बड़ी मुश्किल से वीसा मिला था, तीन दिन रहकर फिर पाकिस्तान चली जाएगी, पर कैसे कटेंगे ये तीन दिन?

'चलो बहू, उपर के कमरे में चलकर आराम करो। मैं चाय भिजवाती हूँ।' कहकर नन्हीं मामी उसे ऊपर पहुँचा आई। रहमान नीचे ही बैठकर मामू से बातों में लग गया और सलमा को तो बड़ी अम्मी ने गोद में ही खींच लिया। बार बार उसके माथे पर हाथ फेरतीं, और हिचकियाँ बँध जाती, 'मेरी इस्मत, मेरी बच्ची।'

ताहिरा ने एकांत कमरे में आकर बुर्का फेंक दिया। बन्द खिड़की को खोला तो कलेजा धक हो गया। सामने लाल हवेली खड़ी थी। चटपट खिड़की बंद कर तख्त पर गिरती-पड़ती बैठ गई, 'खुदाया - तू मुझे क्यों सता रहा हैं?' वह मुँह ढाँपकर सिसक उठी। पर क्यों दोष दे वह किसी को। वह तो जान गई थी कि हिन्दुस्तान के जिस शहर में उसे जाना है, वहाँ का एक-एक कंकड़ उस पर पहाड़-सा टूटकर बरसेगा। उसके नेक पति को क्या पता? भोला रहमान अली, जिसकी पवित्र आँखों में ताहिरा के प्रति प्रेम की गंगा छलकती, जिसने उसे पालतू हिरनी-सा बनाकर अपनी बेड़ियों से बाँध लिया था, उस रहमान अली से क्या कहती?

पाकिस्तान के बटवारे में कितने पिसे, उसी में से एक थी ताहिरा! तब थी वह सोलह वर्ष की कनक छड़ी-सी सुन्दरी सुधा! सुधा अपने मामा के साथ ममेरी बहन के ब्याह में मुल्तान आई। दंगे की ज्वाला ने उसे फूँक दिया। मुस्लिम गुंडों की भीड़ जब भूखे कुत्तों की भाँति उसे बोटी-सी चिचोड़ने को थी तब ही आ गया फरिश्ता बनकर रहमान अली। नहीं, वे नहीं छोडेंगे, हिंदुओं ने उनकी बहू-बेटियों को छोड़ दिया था क्या? पर रहमान अली की आवाज़ की मीठी डोर ने उन्हें बाँध लिया। सांवला दुबला-पतला रहमान सहसा कठोर मेघ बनकर उस पर छा गया। सुधा बच गई पर ताहिरा बनकर। रहमान की जवान बीवी को भी देहली में ऐसे ही पीस दिया था, वह जान बचाकर भाग आया था, बुझा और घायल दिल लेकर। सुधा ने बहुत सोचा समझा और रहमान ने भी दलीलें कीं पर पशेमान हो गया। हारकर किसी ने एक-दूसरे पर बीती बिना सुने ही मजबूरियों से समझौता कर लिया। ताहिरा उदास होती तो रहमान अली आसमान से तारे तोड़ लाता, वह हँसती तो वह कुर्बान हो जाता।

एक साल बाद बेटी पैदा हुई तो रहा-सहा मैल भी धुलकर रह गया। अब ताहिरा उसकी बेटी की माँ थी, उसकी किस्मत का बुलन्द सितारा। पहले कराची में छोटी-सी बजाजी की दुकान थी, अब वह सबसे बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर का मालिक था। दस-दस सुन्दरी एंग्लो इंडियन छोकरियाँ उसके इशारों पर नाचती, धड़ाधड़ अमरीकी नायलॉन और डेकरॉन बेचतीं। दुबला-पतला रहमान हवा-भरे रबर के खिलौने-सा फूलने लगा। तोंद बढ़ गई। गर्दन ऐंठकर शानदार अकड़ से ऊँची उठ गई, सीना तन गया, आवाज़ में खुद-ब-खुद एक अमरीकी डौल आ गया।

पर नीलम-पुखराज से जड़ी, हीरे से चमकती-दमकती ताहिरा, शीशम के हाथी दाँत जड़े छपर-खट पर अब भी बेचैन करवटें ही बदलती। मार्च की जाड़े से दामन छुड़वाती हल्की गर्मी की उमस लिए पाकिस्तानी दोपहरिया में पानी से निकली मछली-सी तड़फड़ा उठती। मस्ती-भरे होली के दिन जो अब उसकी पाकिस्तानी ज़िन्दगी में कभी नहीं आएँगे गुलाबी मलमल की वह चुनरी उसे अभी भी याद है, अम्मा ने हल्का-सा गोटा टाँक दिया था। हाथ में मोटी-सी पुस्तक लिए उसका तरुण पति कुछ पढ़ रहा था। घुँघराली लटों का गुच्छा चौड़े माथे पर झुक गया था, हाथ की अधजली सिगरेट हाथ में ही बुझ गई थी। गुलाबी चुनरी के गोटे की चमक देखते ही उसने और भी सिर झुका दिया था, चुलबुली सुन्दरी बालिका नववधू से झेंपझेंपकर रह जाता था, बेचारा। पीछे से चुपचाप आ कर सुधा ने दोनों गालों पर अबीर मल दिया था और झट चौके में घुसकर अम्मा के साथ गुझिया बनाने में जुट गई थी। वहीं से सास की नज़र बचाकर भोली चितवन से पति की ओर देख चट से छोटी-सी गुलाबी जीभ निकालकर चिढ़ा भी दिया था, उसने। जब वह मुल्तान जाने को हुई तो कितना कहा था उन्होंने, 'सुधा मुल्तान मत जाओ।' पर वह क्या जानती थी कि दुर्भाग्य का मेघ उस पर मंडरा रहा है? स्टेशन पर छोड़ने आए थे, इसी स्टेशन पर। यही कनेर का पेड़ था, यही जंगला। मामाजी के साथ गठरी-सी बनी सुधा को घूँघट उठाने का अवकाश नहीं मिला। गाड़ी चली तो साहस कर उसने घूंघट जरा-सा खिसकाकर अंतिम बार उन्हें देखा था। वही अमृत की अंतिम घूँट थी।
सुधा तो मर गई थी, अब ताहिरा थी। उसने फिर काँपते हाथों से खिड़की खोली, वही लाल हवेली थी उसके श्वसुर वकील साहब की। वही छत पर चढ़ी रात की रानी की बेल, तीसरा कमरा जहाँ उसके जीवन की कितनी रस-भरी रातें बीती थीं, न जाने क्या कर रहे होंगे, शादी कर ली होगी, क्या पता बच्चों से खेल रहें हों! आँखे फिर बरसने लगीं और एक अनजाने मोह से वह जूझ उठी।

'ताहिरा, अरे कहाँ हो?' रहमान अली का स्वर आया और हडबड़ाकर आँखे पोंछ ताहिरा बिस्तरबंद खोलने लगी। रहमान अली ने गीली आँखे देखीं तो घुटना टेक कर उसके पास बैठ गया, 'बीवी, क्या बात हो गई? सिर तो नहीं दुख रहा है। चलो-चलो, लेटो चलकर। कितनी बार समझाया है कि यह सब काम मत किया करो, पर सुनता कौन है! बैठो कुर्सी पर, मैं बिस्तर खोलता हूँ।' मखमली गद्दे पर रेशमी चादर बिछाकर रहमान अली ने ताहिरा को लिटा दिया और शरबत लेने चला गया। सलमा आकर सिर दबाने लगी, बड़ी अम्मा ने आकर कहा, 'नज़र लग गई है, और क्या।' नहीं नजमा ने दहकते अंगारों पर चून और मिर्च से नज़र उतारी। किसी ने कहा, 'दिल का दौरा पड़ गया, आंवले का मुरब्बा चटाकर देखो।'

लाड और दुलार की थपकियाँ देकर सब चले गए। पास में लेटा रहमान अली खर्राटे भरने लगा। तो दबे पैरों वह फिर खिड़की पर जा खड़ी हुई। बहुत दिन से प्यासे को जैसे ठंडे पानी की झील मिल गई थी, पानी पी-पीकर भी प्यास नहीं बुझ रही थी। तीसरी मंज़िल पर रोशनी जल रही थी। उस घर में रात का खाना देर से ही निबटता था। फिर खाने के बाद दूध पीने की भी तो उन्हें आदत थी। इतने साल गुज़र गए, फिर भी उनकी एक-एक आदत उसे दो के पहाड़े की तरह जुबानी याद थी। सुधा, सुधा कहाँ है तू? उसका हृदय उसे स्वयं धिक्कार उठा, तूने अपना गला क्यों नहीं घोंट दिया? तू मर क्यों नहीं गई, कुएँ में कूदकर? क्या पाकिस्तान के कुएँ सूख गए थे? तूने धर्म छोड़ा पर संस्कार रह गए, प्रेम की धारा मोड़ दी, पर बेड़ी नहीं कटी, हर तीज, होली, दीवाली तेरे कलेजे पर भाला भोंककर निकल जाती है। हर ईद तुझे खुशी से क्यों नहीं भर देती? आज सामने तेरे ससुराल की हवेली है, जा उनके चरणों में गिरकर अपने पाप धो ले। ताहिरा ने सिसकियाँ रोकने को दुपट्टा मुँह में दबा लिया।

रहमान अली ने करवट बदली और पलंग चरमराया। दबे पैर रखती ताहिरा फिर लेट गई। सुबह उठी तो शहनाइयाँ बज रही थीं, रेशमी रंग-बिरंगी गरारा-कमीज अबरखी चमकते दुपट्टे, हिना और मोतिया की गमक से पूरा घर मह-महकर रहा था। पुलिस बैंड तैयार था, खाकी वर्दियाँ और लाल तुर्रम के साफे सूरज की किरनों से चमक रहे थे। बारात में घर की सब औरतें भी जाएँगी। एक बस में रेशमी चादर तानकर पर्दा खींच दिया गया था। लड़कियाँ बड़ी-बड़ी सुर्मेदार आंखों से नशा-सा बिखेरती एक दुसरे पर गिरती-पड़ती बस पर चढ़ रही थीं। बड़ी-बुढ़ियाँ पानदान समेटकर बड़े इत्मीनान से बैठने जा रही थीं और पीछे-पीछे ताहिरा काला बुर्का ओढ़कर ऐसी गुमसुम चली जा रही थी जैसे सुध-बुध खो बैठी हो। ऐसी ही एक सांझ को वह भी दुल्हन बनकर इसी शहर आई थी, बस में सिमटी-सिमटाई लाल चुनर से ढ़की। आज था स्याह बुर्का, जिसने उसका चेहरा ही नहीं, पूरी पिछली जिन्दगी अंधेरे में डुबाकर रख दी थी।

'अरे किसी ने वकील साहब के यहां बुलौआ भेजा या नहीं?'
बड़ी अम्मी बोलीं ओर ताहिरा के दिल पर नश्तर फिरा।
'दे दिया अम्मी।' मामूजान बोले, 'उनकी तबीयत ठीक नहीं है, इसी से नहीं आए।'
'बड़े नेक आदमी हैं' बड़ी अम्मी ने डिबिया खोलकर पान मुंह में भरा,
फिर छाली की चुटकी निकाली और बोली, 'शहर के सबसे नामी वकील के बेटे हैं पर आस न औलाद। सुना एक बीवी दंगे में मर गई तो फिर घर ही नहीं बसाया।'

बड़ी धूमधाम से ब्याह हुआ, चांद-सी दुल्हन आई। शाम को पिक्चर का प्रोग्राम बना। नया जोड़ा, बड़ी अम्मी, लड़कियाँ, यहाँ तक कि घर की नौकरानियाँ भी बन-ठनकर तैयार हो गई। पर ताहिरा नहीं गई, उसका सिर दुख रहा था। बे सिर-पैर के मुहब्बत के गाने सुनने की ताकत उसमें नहीं थी। अकेले अंधेरे कमरे में वह चुपचाप पड़ी रहना चाहती थी - हिन्दुस्तान, प्यारे हिन्दुस्तान की आखिरी साँझ।
जब सब चले गए तो तेज बत्ती जलाकर वह आदमकद आईने के सामने खड़ी हो गई। समय और भाग्य का अत्याचार भी उसका अलौकिक सौंदर्य नहीं लूट सका। वह बड़ी-बड़ी आँखें, गोरा रंग और संगमरमर-सी सफेद देह

-- कौन कहेगा वह एक जवान बेटी की माँ है? कहीं पर भी उसके पुष्ट यौवन ने समय से मुँह की नहीं खाई थी। कल वह सुबह चार बजे चली जाएगी। जिस देवता ने उसके लिए सर्वस्व त्याग कर वैरागी का वेश धर लिया है, क्या एक बार भी उसके दर्शन नहीं मिलेंगे? किसी शैतान-नटखट बालक की भाँति उसकी आँखे चमकने लगीं।

झटपट बुर्का ओढ़, वह बाहर निकल आई, पैरों में बिजली की गति आ गई, पर हवेली के पास आकर वह पसीना-पसीना हो गई। पिछवाड़े की सीढ़ियाँ उसे याद थीं जो ठीक उनके कमरे की छोटी खिड़की के पास अकर ही रुकती थीं। एक-एक पैर दस मन का हो गया, कलेजा फट-फट कर मुंह को आ गया, पर अब वह ताहिरा नहीं थी, वह सोलह वर्ष पूर्व की चंचल बालिका नववधू सुधा थी जो सास की नज़र बचाकर तरुण पति के गालों पर अबीर मलने जा रही थी। मिलन के उन अमूल्य क्षणों में सैयद वंश के रहमान अली का अस्तित्व मिट गया था। आखिरी सीढ़ी आई, सांस रोककर, आँखे मूँद वह मनाने लगी, 'हे बिल्वेश्वर महादेव, तुम्हारे चरणों में यह हीरे की अँगूठी चढ़ाऊँगी, एक बार उन्हें दिखा दो पर वे मुझे न देखें।'

बहुत दिन बाद भक्त भगवान का स्मरण किया था, कैसे न सुनते? आँसुओं से अंधी ने देवता को देख लिया। वही गंभीर मुद्रा, वही लट्ठे का इकबर्रा पाजामा और मलमल का कुर्ता। मेज़ पर अभागिन सुधा की तस्वीर थी जो गौने पर बड़े भय्या ने खींची थी।
'जी भरकर देख पगली और भाग जा, भाग ताहिरा, भाग! ' उसके कानों में जैसे स्वयं भोलानाथ गरजे।

सुधा फिर डूब गई, ताहिरा जगी। सब सिनेमा से लौटने को होंगे। अंतिम बार आँखों ही आँखों में देवता की चरण-धूलि लेकर वह लौटी और बिल्वेश्वर महादेव के निर्जन देवालय की ओर भागी। न जाने कितनी मनौतियाँ माँगी थीं, इसी देहरी पर। सिर पटककर वह लौट गई, आँचल पसारकर उसने आखिरी मनौती माँगी, 'हे भोलेनाथ, उन्हें सुखी रखना। उनके पैरों में काँटा भी न गड़े।' हीरे की अँगूठी उतारकर चढ़ा दी और भागती-हाँफती घर पहुँची।

रहमान अली ने आते ही उसका पीला चेहरा देखा तो नब्ज़ पकड़ ली, 'देखूँ, बुखार तो नहीं है, अरे अँगूठी कहाँ गई?' वह अँगूठी रहमान ने उसे इसी साल शादी के दिन यादगार में पहनाई थी।
'न जाने कहाँ गिर गई?' थके स्वर में ताहिरा ने कहा।
'कोई बात नहीं' रहमान ने झुककर ठंडी बर्फ़-सी लंबी अँगुलियों को चूमकर कहा, 'ये अँगुलियाँ आबाद रहें। इन्शाअल्ला अब के तेहरान से चौकोर हीरा मँगवा लेंगे।'

ताहिरा की खोई दृष्टि खिड़की से बाहर अंधेरे में डूबती लाल हवेली पर थी, जिसके तीसरे कमरे की रोशनी दप-से-बुझ गई थी। ताहिरा ने एक सर्द साँस खींचकर खिड़की बन्द कर दी।

लाल हवेली अंधेरे में गले तक डूब चुकी थी।

Amritghat


एक थी -अमृता। समंदर के किनारे रहती, रेत के घर बनाती। समुद्र के किनारे मिट्टी तो होती नहीं इसलिए अमृता रेत के ही घर बनाती, पर रेत में मिट्टी की तरह लोच नहीं होती, इसलिए मिट्टी के घरों की तरह अमृता के रेत के घर टिक नहीं पाते, जैसे ही भीगी रेत का पानी सूखने लगता, घर भरभराकर गिर पड़ते।
धीरे-धीरे अमृता ने घर बनाना छोड़ दिया। अब वह किनारे पर बैठकर समंदर देखा करती। सुबह समुद्र की सतह पर सूरज के लाल होते प्रकाश को देखती। दिन भर दहकते, तपते सूरज को शाम को समुद्र में ठंडा होते देखती। लहरों का उल्लास से उछलना, दौड़ना और आना-जाना देखती।
मगर अमृता ने अपनी किश्ती लहरों के हवाले कर रखी थी। लहरें जहाँ चाहतीं, अमृता चली जाती और मजे की बात जहाँ लहरें ले जातीं, अमृता को वहीं अच्छा लगने लगता। अमृता जानती थी कि लहरें एक दिन उसे जरूर क्षितिज पर ले जाएँगी, जहाँ से वह आसमान को छूकर देख सकेगी। जहाँ से वह लोचदार मिट्टी लाकर घर बना सकेगी। दिन में अमृता सूरज का ताप लेती। ताप बढ़ने लगता, तो कोई बड़ी लहर आकर अमृता को अपने आँचल से पलभर के लिए ढकती, भिगोती और लौट जाती।

रात होती तो अमृता चाँद को देखा करती, चाँद से बातें करती और चाँदनी पिया करती। वह इतनी छककर चाँदनी पीती कि उसके हृदय का खाली घट अमृत से भरने लगता, भर-भरकर छलकने लगता, तब वह समंदर में देखती, तो लगता चाँदनी का अमृत समंदर की लहरों पर बिछ गया है। जब पंद्रह दिन चाँद नहीं होता, तब अमृता अपने छलकते अमृत घट में से चाँदनी पीती और ऐसे ही जीती।

एक दिन लहरों ने अमृता को एक दूसरी किश्ती के करीब पहुँचा दिया। किश्ती अकेली न थी, उस पर सवार भी था। जब अमृता ने किश्ती-सवार को देखा, तो देखती ही रह गयी। अमृता को लगा कि चाँद, आसमान से उतरकर किश्ती-सवार के चेहरे पर आ गया है। अब वह हाथ बढ़ाकर चाँद को छू सकती है, पर अमृता को हाथ बढ़ाने की जरूरत ही न पड़ी। चाँद खुद ही अमृता के करीब आ गया और अमृता करीब आए चाँद के होंठों से चाँदनी पीने लगी। दोनों मिले और पानी पर एकदम से जाने कैसे, जरा देर को घर बन गया।

ठीक उसी वक्त आसमान में स्वाति नक्षत्र चमका। अमृता ने देखा जल की सतह पर तैर रही एक सीपी की प्रतीक्षा सार्थक हुई। उसने स्वाति की बूँद को ग्रहण किया, अपने-आपको बंद किया और डुबकी लगाती हुई समुद्र तल में जाकर बूँद को मोती का रूप देने में लग गई।

अमृता सोचने लगी काश वह भी इस सीपी-सी स्वाति की बूँद पा ले और समंदर के अतल तल में जाकर कोई मोती गढ़े।
तभी लहरों ने अमृता को किश्ती-सवार से दूर ले जाकर पटक दिया।

किश्ती-सवार उसे फिर मिले-न-मिले, यह सोचकर अमृता बेचैन होने लगी, पर तभी उसने हवा में किश्ती-सवार की आवाज सुनी, अमृता ने भी कुछ कहा, जो किश्ती सवार ने हवा में सुना। ऐसा बार-बार होने लगा। हवा दोनों के प्यार को समझती थी, इसीलिए दोनों की आवाज एक-दूसरे तक पहुँचा देती थी।

फिर किश्ती सवार ने चाँद की चाँदनी पर अमृता को प्यारभरा खत लिखा। अमृता ने भी उसी प्यार से जवाब दिया। चाँदनी भी उन्हें प्यार करती थी और उनके खत पहुँचाया करती थी। कभी हवा के जरिये, तो कभी चाँदनी पर खत लिखकर दोनों बहुत कुछ कहते, बहुत कुछ सुनते। अब अमृता आसमान के चाँद को नहीं देखती, चाँदनी नहीं पीती। अब वह सिर्फ हवा में किश्ती-सवार की बातें सुनती, चाँदनी पर लिखे उसके खत पढ़ती और उसे खत लिखती।

कभी लहरों को उन पर प्यार आता, तो वे उन दोनों को मिला देतीं, तब वे दोनों जल्दी से पानी पर घर बना लेते, फिर जल्दी ही लहरें उन्हें अलग कर देतीं। अमृता फिर अकेली हो जाती और किश्ती-सवार उस टापू पर पहुँच जाता, जहाँ उसका अपना मिट्टी का घर था, जो अमृता के बिना लोचवाली रेत के घर की तरह ताप से टूटा नहीं था। वह तो लोचदार मिट्टी से बना घर था, जो ताप पाकर और पक्का हो गया था।

पर अमृता उसके मिट्टी के घर में न जा सकती थीं और न ही जाना चाहती थी, इसके दो कारण थे - एक तो अमृता को किश्ती में पानी पर तैरते-तैरते यों ही भटकने की आदत हो गई थी, उसे यही अच्छा लगता था और दूसरे रेत के टूटते-बिखरते घर देखकर उसे मिट्टी के घर में भी जाने से डर लगता था, फिर किश्ती-सवार के मिट्टी के घर में अमृता के रहने की गुंजाइश भी तो नहीं थी। आपस में मिलना ही दोनों को इतनी पूर्णता से भर देता था कि इस बारे में उन्हें कुछ सोचने की जरूरत ही न थी। इसीलिए दोनों ने इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं।

जब दोनों के मिलने से पानी पर घर बनता, तो अमृता इसी घर में सुख के कुछ पल पा लेती। जब लहरें उसे दूर ले जाकर पटक देतीं, तो अमृता घर बनाकर जीये हुए इन्हीं पलों को बार-बार जीती और आगे इन्हीं पलों के दुहराने की प्रतीक्षा मे रत रहती। इन्हीं दो-चार पलों के लिए अमृता सारे पल जिया करती और इंतजार के खामोश पल पिया करती।

लहरें दौड़ती हुई आतीं और अमृता को भिगो जातीं। जब वह रेत पर खड़ी होकर समंदर देखती, तो लहरें बार-बार आतीं और अमृता के पैरों के नीचे से रेत बहाकर ले जातीं। अमृता को यह भी बड़ा भला लगता। अतल, अछोर समंदर को देखते हुए अक्सर दूर क्षितिज पर उसकी आँखें टिक जाया करतीं। वहाँ आसमान का समंदर से मिल जाना, अमृता को घर का-सा आभास देता।

एक दिन अमृता को एक छोटी-सी किश्ती मिल गई। अमृता उस किश्ती पर सवार होकर समंदर में पानी पर घूमने लगी। अगर उसे कहीं जाना था, तो क्षितिज पर। जहाँ घर था जहाँ से उसे आसमान को छूकर देखना था।

Monday, November 23, 2009

shayri


1)
Dil ko kya ho gaya, khuda jaane
kyon hai aisa udaas kya jaane
keh diya maine haal aur dil apna
usko hum jaane ya khuda jaane...


2)
Badi mushkil me hu,
mein kaise izhaar karu,
tu to khushbu hain,
tujhe kaise giraftar karu....


3)
Phool khilte hain, khil kar bikhar jate hai,
Phool khilte hain, khil kar bikhar jate hain,
Yaade to dil me rehti hai, Dost mil kar bichad jate hai...


4)
Khilte hai gul yaha, khilke bikherne ko,
Milte hai dil yaha, milke bicharne ko...


5)
Chand ki raton mei sara jahaan sota hai,
Lekin Teri yaadon mei koi badnasib rota hai...


6)
Buj gaya bhi to kya apne dil ke diya,
Abh na roenge hum roshni ke liye,
Dil ka shisha jo tuta to gam kyu kare,
Dard kai hai bus zindagi ke liye...


7)
Ya khuda maaf karna tere is gunehgaar bande ko,
Jo tumhari chamatkaar me dakhil hota hai,
Sirf ye puchne ke liye aaya hu mein,
Ke kyu har raat ko mera dil rota hai...


8)
Tumhare pyaar me hamne bhohot chote khaye,
Jiska hisaab na hosake utne dard paye,
Phirbhi tere pyaar ki kasam khake kehtahu,
Hamare lab pe tumhare liye sirf pyaar aaye...


9)
Khuda kisiki muhabbat pe fida na kare,
Agar kare to zindagi bhar judaa na kare...


10)
Kaise kahe ke aap kitni khubsurat hai,
Kaise kahe ke hum aap pe marte hai,
Yeh to sirf mera dil hi janta hai,
Ke hum aap pe hamari jawani qurban karte hai...

Ishq Ne Tere Dil Mere Teer Gazab Ka Maara


Ishq Ne Tere Dil Mere Teer Gazab Ka Maara
Bhikar Gaya Sab Toot Gaya Dil Ho Gaya Paara Paara
Ishq Ne Tere Dil Mere Teer Gazab Ka Maara
Bhikar Gaya Sab Toot Gaya Dil Ho Gaya Paara Paara
Aaye Re Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein

Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein

Chori Chori Saans Ki Dori Meine Tere Naam Ke Moti Daal Ke
Maala Pheri Aisi Teri Hogay Cherche Yaara Mere Haal Ke
Khabhar Huyi Mein Ho Teri Khatir
Ishq Ka Mere Kahin Hai Haasil
Sajan Mera… Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein

Baar..Baar..Baar…Baar..Baar…Baar…

Seekhe Seekhe Meine Seekhe Tevar Teri Yaari Mein Hai Khelne
Haar Haar Ke Roz Pyar Ke Khel Yaar Phir Bhi Hai Kaise Khelne
Haare Ya Jeete Sochna Kaisa
Dilon Ka Khel To Hota Hai Aisa
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Ishq Ne Tere Dil Mere Teer Gazab Ka Maara
Bhikar Gaya Sab Toot Gaya Dil Ho Gaya Paara Paara
Aaye Re Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein
Sajan Mera Baar Baar Baar Baar Gusse Mein

Tuesday, October 20, 2009

भिखारी ठाकुर


बिहार के सारण जिले में छपरा शहर से लगभग दस किलोमीटर पूर्व में चिरान नामक स्थान के पास कुतुबपुर गांव में भिखारी ठाकुर का जन्म पौष मास शुक्ल पंचमी संवत् 1944 तद्नुसार 18 दिसंबर, 1887 (सोमवार) को दोपहर बारह बजे शिवकली देवी और दलसिंगार ठाकुर के घर हुआ था ।
आज भी अपनी दीन-हीन दशा पर आंसू बहाता खडा है कुतुबपुर गांव, जो कभी भोजपुर (शाहाबाद) जिले में था, पर अब गंगा की कटान को झेलता सारण (छपरा) जिले में आ गया है। इसी गांव के पूर्वी छोर पर स्थित है भिखारी ठाकुर का पुश्तैनी, कच्चा, पुराना, खपरैल का मकान।
अपने मां-बाप की ज्येष्ठ संतान भिखारी ने नौ वर्ष की अवस्था में पढाई शुरू की। एक वर्ष तक तो कुछ भी न सीख सके। साथ में छोटे भाई थे बहोर ठाकुर। बाद में गुरु भगवान से उन्होंने ककहरा सीखा और स्कूली शिक्षा अक्षर-ज्ञान तक ही सीमित रही। बस, किसी तरह टो-टाकर वह रामचरित मानस पढ लेते थे। वह कैथी लिपि में ही लिखते थे, जिसे दूसरों के लिए पढ पाना मुश्किल होता था। पर लेखन की मौलिक प्रतिभा तो उनमें जन्मजात थी। इस प्रकार, शिक्षा में वह कबीर की श्रेणी में आते हैं।
किशोरावस्था में ही उनका विवाह मतुरना के साथ हो गया। लुक-छिपकर वह नाच देखने चले जाते थे और नृत्य-मंडलियों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी अदा करने लगे थे। पर मां-बाप को यह कतई पसंद न था। फिर तो एक रोज गांव से भागकर वह खडगपुर जा पहुंचे। मेदिनीपुर जिले की रामलीला और जगन्नाथपुरी की रथयात्रा देख उनके भीतर का सोया हुआ कलाकार पुन: जाग उठा और गांव लौटे तो कलात्मक प्रतिभा और धार्मिक भावनाओं से पूरी तरह लैस होकर। तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने विदेसिया की रचना की। फिर तो उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। परिवार के विरोध के बावजूद नृत्यमंडली का गठन कर वह शोहरत की बुलंदियों को छूने लगे। जन-जन की जुबान पर बस एक ही नाम-भिखारी ठाकुर! कलाकारों के कलाकार-मल्लिक जी!

वर्ष 1938 से 1962 के मध्य भिखारी ठाकुर की लगभग तीन दर्जन पुस्तिकाएं छपीं, जिन्हें फुटपाथों से खरीदकर लोग चाव से पढा करते थे। अधिकांश पुस्तिकाएं दूधनाथ प्रेस, सलकिया (हावडा) और कचौडी गली (वाराणसी) से प्रकाशित हुई थीं। नाटकों व रूपकों में बहरा बहार (विदेशिया), कलियुग प्रेम (पियवा नसइल), गंगा-स्नान, बेटी वियोग (बेटी बेचवा), भाई विरोध, पुत्र-बधु, विधवा-विलाप, राधेश्याम बहार, ननद-भौज्जाई, गबरघिंचोर आदि मुख्य हैं। लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम, कुतुबपुर ने 1979 और 1986 में भिखारी ठाकुर ग्रंथावली के पहले तथा दूसरे खंड का प्रकाशन किया था और अब संपूर्ण रचनावली एक जिल्द में ही बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से प्रकाशित हो चुकी है। समालोचक महेश्वराचार्य ने जहां पहले 1964 में जनकवि भिखारी ठाकुर, फिर 1978 में परिव‌िर्द्धत संस्करण भिखारी की रचना की, वहीं इन पंक्तियों के लेखक ने समालोचनात्मक मोनोग्राफ लिखा। प्रख्यात कथाकार संजीव ने भी भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित सूत्रधार उपन्यास की रचना की है। मगर आलोचना-समालोचना से परे सादा जीवन, उच्च विचार की जीवंत प्रतिमूर्ति थे मल्लिक जी। रोटी, भात, सत्तू-जो भी मिल जाता, ईश्वर का प्रसाद मानकर प्रेमपूर्वक खाते थे। भोजन के बाद गुड भी। बिना किनारी की धोती, छह गज की मिरजई, सिर पर साफा और पैरों में जूता उनका पहनावा था। उनकी दिली तमन्ना भी थी-सदा भिखारी रहसु भिखारी!

10 जुलाई, 1971 (शनिवार) को चौरासी वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ था। राय बहादुर का खिताब, बिहार सरकार से ताम्रपत्र, जिलाधिकारी (भोजपुर) से शील्ड, विदेसिया फिल्म से प्रसिद्धि और जनता में अभूतपूर्व लोकप्रियता मिलने के बाद भी आजीवन कोई अहम् भाव नहीं। दरवाजे के सामने जमीन पर चटाई बिछाकर बैठे रहते, अपने आपको सबसे छोटा आदमी मानकर चलते और उम्र में छोटा हो या बडा, सबका हाथ जोडकर ही अभिवादन किया करते थे। महापंडित राहुल जी ने भिखारी को जहां भोजपुरी का शेक्सपियर व अनगढ हीरा कहा था, वहीं जगदीशचंद्र माथुर ने उन्हें भरतमुनि की परंपरा का (प्रथम) लोकनाटककार माना था। मगर समीक्षक रामनिहाल गुंजन का मानना है-भिखारी अपने रूढिमुक्त और प्रगतिशील सामाजिक दृष्टिकोण के चलते भारतेंदु के ज्यादा करीब हैं, इसलिए उन्हें भोजपुरी का भारतेंदु हरिश्चंद्र कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। इसी अर्थ में उनका उचित मूल्यांकन भी करना संभव होगा।

भिखारी ने भोजपुरी को अभूतपूर्व ऊंचाई, गहराई व विस्तार दिया। खांटी माटी और जनजीवन से गहरे जुडा उनका साहित्य जनसामान्य का कंठहार बन गया तथा भोजपुरी व भिखारी-दोनों एक-दूसरे के पूरक-से हो गए। अपनी नृत्यमंडली के माध्यम से भिखारी धूमकेतु की तरह छा गए और ज्यों-ज्यों वक्त गुजरता जा रहा है, भिखारी के व्यक्तित्व-कृतित्व की चमक और बढती जा रही है। मगर आज भी उनका और उनके सृजन का सार्थक मूल्यांकन होना शेष है।
गोस्वामी तुलसीदास व कबीर की तरह यदि लोकभाषा के किसी कवि-कलाकार को संपूर्ण उत्तर भारत के जन-जन में प्रचंड लोकप्रियता मिली, तो वह थे भिखारी ठाकुर। भिखारी का अभ्युदय उस समय हुआ, जब देश की आम जनता विदेशियों की त्रासद दासता झेलने के साथ ही अज्ञानता, सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास व रूढियों की बेडियों में बुरी तरह जकडी हुई थी। सर्वाधिक बुरी स्थिति नारियों की थी, जो खूंटे से बंधी गाय की तरह बाल विवाह, बेमेल विवाह का शिकार हो, विधवा का जीवन जीने के लिए अभिशप्त थीं। भिखारी ने अत्यंत निर्धन परिवार में जन्म लेकर न सिर्फ समाज के दबे-कुचले वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि मुख्य रूप से आधी आबादी की बदहाली को ही अपनी सृजनधर्मिता का विषय बनाया। वह लोकभाषा की अकूत क्षमता से बखूबी परिचित थे, तभी तो निरक्षर होने के बावजूद जन-जन तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में न केवल सबसे पहले लोक नाटकों का प्रभावोत्पादक प्रणयन व मंच-प्रस्तुति की, वरन लोकशैली विदेसिया के प्रवर्तक के रूप में भी प्रख्यात हुए। लोकनाटककार, जनकवि, अभिनेता, निर्देशक, सूत्रधार आदि अनेक मौलिक गुणों से संपन्न भिखारी सबसे पहले मनुष्य थे-मनुष्यता की कसौटी पर खरे उतरने वाले अप्रतिम कलाकार।

(sajna)


sajna jaye base pardes
sajna jaye base pardes
mora soona kargaye des,
mora soona kargaye des
sajna jaye base pardes

bawari main to hogayee sajan
bawari main to hogayee sajan,phirti ho main banke jogan,
phirti ho main banke jogan
jane kya kya badle bhes
jane kya kya badle bhes
sajna jaye base pardes
sajna jaye base pardes

kajano gaye kyon nagariya bheji na ab tak koi khabariyaa
kajano gaye kyon nagariya bheji na ab tak koi khabariyaa
koi lade re sandes,koi lade re sandes
sajna jaye base pardes
sajna jaye base pardes
mora soona kargaye des,
mora soona kargaye des
sajna jaye base pardes
sajna jaye base pardes

Maili Chaadar Odhke Kaise
dwaar Tumhaare Aaoon
hey Paavan Parameshwara Mere
man Hi Man Sharmaaoon

[maili Chaadar …]

tune Mujhko Jag Me Bhejaa
nirmal Dekar Kaayaa
is Sansaar Me Aakar Maine
isko Daag Lagaaya
janam Janam Ki Maili Chaadar
kaise Daag Chudaaoon

[maili Chaadar …]

nirmal Vaani Paakar Tujhse
naam Na Teraa Gaayaa
nain Moondhkar He Parameshwar
kabhi Naa Tujhko Dhyaayaa
man Veena Ki Taaren Tooti
ab Kyaa Geeth Sunaaoon

[maili Chaadar …]

in Pairon Se Chal Kar Tere
mandir Kabhi Na Aayaa
jahaan Jahaan Ho Poojaa Teri
kabhi Naa Sees Jhukaayaa
hey Harihar Main Haar Ke Aayaa
ab Kyaa Haar Chadhaaoon

[maili Chaadar …]

Friday, October 2, 2009

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।
रचनाकार: भारतेंदु हरिश्चंद्र
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं [...]

पूरब के बेटा


अउर कौनो बंधन न ह , पर दिल के बंधन तोडा ना
जवन ह हमरे पास, ह तुहार , येसे तु मुख मोडा ना ।
बोला चाहे न कुछ बोला, मन के अपने कहेदा ,
दुनिया में रहे के बा मुश्किल, सपना में त रहेदा।
मन जौनो बात ह [...]

This bhojpuri song writen by me

ek jhatakaa ma cheekh nikal gay
kamar toot gay ara-raraa
mori akhia se aans girat ba
hasay uthalloo kharaa-kharaa
solah saal ki bhail umariya
kabhau na baitha bhamara
na to dekhe tal talaiya
na kamaroo na kamaraa
pahali baar ham narvas hoy gay
bahee jawani taraa-taraa
ek jhatkaa...
bari jatan se yah dehiya ka
ammaa aaji paali
pappaa kaka seench ke hamri
kanchan kar dee daali
more badan par masha na baithaa
saraa ras hai bharaa-bharaa
ek jhatkaa.......
pata chalat ba kaisee katati sadi wali raat
bara bedardi ye pal hota samajhe na koi baat
dard se dehiya kapan laage
kahe gaal ko thora hiya kara
ek jhatakaa ma cheekh nikal gay
kamar toot gay ara-raraa
akhia se aans girat ba
hasay uthalloo kharaa-kharaa

Wednesday, September 30, 2009

हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा

बर्बाद कजरवा हो गइले

बाहरे बलम बिना नींद ना आवे

बाहरे बलम बिना नींद ना आवे

उलझन में सवेरवा हो गइले

हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा

बर्बाद कजरवा हो गइले
बिजुरी चमके देवा गर्जे

घनघोर बदरवा हो गइले

पापी पपीहा बोलियाँ बोले

पापी पपीहा बोलियाँ बोले

दिल धड़के सुवेरवा हो गइले

बाहरे बलम बिन नींद न आवे

उलझन में सुवेरवा हो गइले

हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा

बर्बाद कजरवा हो गइले
आ...................................

अरे पहिले पहिले जब अइलीं गवनवा

सासू से झगड़ा हो गइले

बाकें बलम पर...अहा अहा

बांके बलम परदेसवा विराजें

उलझन में सुवेरवा हो गइले

हाथ में मेंहदी मांग सिंदुरवा

बर्बाद कजरवा हो गइले

Saturday, September 5, 2009


Chahah Toh Bahut

Chahah Toh Bahut Leken Woh Milah Nahin
Lakh Koshesh Keh Magar Yeh Fasla Mitah Eh Nahi

Na Jane Zamane Ne Majbor Es Qadar Kardia
Ke woh Meri Kaise Sada Pe Tehraa Eh Nahi

Main Tamam Tar Koshish Keh Bawjood Hargaya
Woh Useh Milgaye Jis Ne Usko Manga Eh Nahin

Har Ek Seh Pucha Tere Na Milne Ka Sabab
Har Ek Ne Kaha Woh Tere Leye Bane Eh Nahi

Itne Shedat Seh Seh Chahah Tah Usko
Es Dunia Main Shayad Wafa Ka Sila eh Nahi

utf woh ishq mein paye hain ke jee janta hai
ranj bhi aise uthaye hain ke jee janta hai...
jo zamane ke sitam hai woh zamana jaane
tune dil itne dukhaaye hain ke jee janta hai...
muskurate huye woh majmaa agiyaar ke saath
aaj yun bazm mein aaye hai hain ke jee janta hai...
innhi qadmon ne tumhare innhi qadmo ki qasam
Khaak mein itne milaye hain ke jee jaanta hai
saadgi, bankpan, agmaaz, shararat, shokhi
tune andaz woh paaye hain ke jee janta hai...
qaba-o-dair mein pathra gayi dono ankhein
aise jalwe nazar aaye hain ke jee janta hai...
tum nahin jaante ab tak ye tumhare andaaz
vo mere dil mein samaaye hain ke jee jaanta hai
dosti mein teri, darparda hamare dushman
iss qadar apne paraye hain ke jee janta hai...
'daag'-e-warafta ko hum aaj tere kooche se
iss tarah kheinch ke laye hain ke jee janta hai

dil


karte hain vo iss tarha mere dil se ched chad
katil kare hai jis tarha bismil se ched chad
leharon pe jinko jaan ke lale pade rahe
sahil par aa gaye hain toh sahil se ched chad
vo gul, khizan naseeb, jahannum raseed ho
gulshan mein jisne ki hai tere till se ched chad
laila ki deed ke liye baad-e-samoom bhi
karti hai badh ke parda mehmal se ched chad
lagta nahi hun moun, main raqeebon ke in dino
yeh umar ho toh, hoti hai mushkil se ched chad
khud hi mujhe vo bhej ke zindan mein, keh uthe
kis silsile mein hai yeh salasal se ched chad
fitrat mein ched chad hai sakoot ke iss qadar
magtal mein hai toh qatil-e-khanjr se ched chad

Ye soch ke milna ki jab miloge use,
Wo kuchh na kahega to kya kahoge use !
vo aayega toh apne aap mein kab aaoge tum,
vo chala gaya toh juda kis tarah karoge usse !
abhi dhoop hai jitna jii chahe dekh lo ussko,
chirag le ke kahan dhoondhte firoge usse !
vo raushni ki tarah, haath kaise aayega,
tamaam umra faqat dekhte rahoge usse !!
meri soch hai adhoori mere lafz hai paraaye
veh ghazal kahan se laaon jo tumhen pasand aaye ..
mere pyar ke bharam ko mere dastan-e-gham ko
kai log sun ke roye kai log muskuraaye ..
mere paas kuch dinon se mera aaiina nahin hai
kai roz ho chuke hain mujhe apna ghar sajaaye ..
kahin raaste mein uss ne mera haath choo liya tha
toh kalaaiyon ke kangan kai roz khankhanaaye ..
meri yeh tamnna 'bedil' kabhi ho saki na poori
ki main rooth jaaon jab bhi mujhe aa ke vo manaaye ..

masala

har maslaa
'masal' se
maslaa nahin jaata
ho chaukhat pe sailaab
toh uss se lada nahin jaata

jab se suna
ki lakeeiron mein takdeer hai meri
mere haathon se
mera haath
mala nahin jaata

samandar mein mandir
kahin chhupa hai jaroor
bina juute utaare
uss mein utra nahin jaata

jab bhi sanwarti hain
bohat bhigadti hain julfein
kehin hain
kyun azad hamen rakha nahin jaata ?

mujhe hoti samjh
toh tumhen na batata ?
ki kuch hoti hai baatein

shayri

bhagwan tujhe main khat likhta, par tera pata mallum nahin
buron ki jeet duniya mein, bhalaai thokarein khaaye
yahan kya ho raha maalik, ye kaise koi batalaye
roa roa likhta jag ki bipata, par tera pata mallum nahin

duniya mein tujhe bura lage ya bhala lage, teri duniya apne ko jammi nahin
kuch kehte huye darr lagta hai yahan, dushton ki kuch kammi nahin maalik
maalik tujhe main sab kuch samjhaata, par tera pata mallum nahin

mallum nahin mere sar pe dukhon ki gathari hai, raaton ko nahin main sota hun
kahin jaag uthe na padosi iss liye zor se nahin main rota hun
tere saamne baith ke main rota par, tera pata mallum nahin

nahin kuch kahun toh duniya kehti hai aansu na baha bakwaas na kar
aisi duniya mein mujhe rakh ke maalik, mera satyaanaas na kar
tere paas main khud hi aa jaata, par tera pata mallum nahin

Sunday, August 9, 2009

मां के पैरों को चूम लीया।

जाड़ों की रात थी। दस बजे ही सड़कें बन्द हो गयी थीं और गालियों में सन्नाटा था। बूढ़ी बेवा मां ने अपने नौजवान बेटे धर्मवीर के सामने थाली परोसते हुए कहा-तुम इतनी रात तक कहां रहते हो बेटा? रखे-रखे खाना ठंडा हो जाता है। चारों तरफ सोता पड़ गया। आग भी तो इतनी नहीं रहती कि इतनी रात तक बैठी तापती रहूँ।
धर्मवीर हृष्ट-पुष्ट, सुन्दर नवयुवक था। थाली खींचता हुआ बोला-अभी तो दस भी नहीं बजे अम्मॉँ। यहां के मुर्दादिल आदमी सरे-शाम ही सो जाएं तो कोई क्या करे। योरोप में लोग बारह-एक बजे तक सैर-सपाटे करते रहते हैं। जिन्दगी के मज़े उठाना कोई उनसे सीख ले। एक बजे से पहले तो कोई सोता ही नहीं।
मां ने पूछा-तो आठ-दस बजे सोकर उठते भी होंगे।
धर्मवीर ने पहलू बचाकर कहा-नहीं, वह छ: बजे ही उठ बैठते हैं। हम लोग बहुत सोने के आदी हैं। दस से छ: बजे तक, आठ घण्टे होते हैं। चौबीस में आठ घण्टे आदमी सोये तो काम क्या करेगा? यह बिलकुल गलत है कि आदमी को आठ घण्टे सोना चाहिए। इन्सान जितना कम सोये, उतना ही अच्छा। हमारी सभा ने अपने नियमों में दाखिल कर लिया है कि मेम्बरों को तीन घण्टे से ज्यादा न सोना चाहिए।
मां इस सभा का जिक्र सुनते-सुनते तंग आ गयी थी। यह न खाओ, वह न खाओ, यह न पहनो, वह न पहनो, न ब्याह करो, न शादी करो, न नौकरी करो, न चाकरी करो, यह सभा क्या लोगों को संन्यासी बनाकर छोड़ेगी? इतना त्याग तो संन्यासी ही कर सकता है। त्यागी संन्यासी भी तो नहीं मिलते। उनमें भी ज्यादातर इन्द्रियों के गुलाम, नाम के त्यागी हैं। आज सोने की भी क़ैद लगा दी। अभी तीन महीने का घूमना खत्म हुआ। जाने कहां-कहां मारे फिरते हैं। अब बारह बजे खाइए। या कौन जाने रात को खाना ही उड़ा दें। आपत्ति के स्वर में बोली-तभी तो यह सूरत निकल आयी है कि चाहो तो एक-एक हड्डी गिन लो। आख़िर सभावाले कोई काम भी करते हैं या सिर्फ़ आदमियों पर कैदें ही लगाया करते हैं?
धर्मवीर बोला-जो काम तुम करती हो वहीं हम करते हैं। तुम्हारा उद्देश्य राष्ट़ की सेवा करना है, हमारा उद्देश्य भी राष्ट़ की सेवा करना है।
बूढ़ी विधवा आजादी की लड़ाई में दिलो-जान से शरीक थी। दस साल पहले उसके पति ने एक राजद्रोहात्मक भाषण देने के अपराध में सजा पाई थी। जेल में उसका स्वास्थ्य बिगड़ गंया और जेल ही में उसका स्वर्गवास हो गया। तब से यह विधवा बड़ी सच्चाई और लगन से राष्ट़ की सेवा सेवा में लगी हुई थी। शुरू में उसका नौजवान बेटा भी स्वयं सेवकों में शमिल हो गया था। मगर इधर पांच महीनों से वह इस नयी सभा में शरीक हो गया और उसको जोशीले कार्यकर्ताओं मे समझा जाता था।
मां ने संदेह के स्वर में पूछा-तो तुम्हारी सभा का कोई दफ्तर हैं?
‘हां है।’
‘उसमें कितने मेम्बर हैं?’
‘अभी तो सिर्फ़ पचास मेम्बर हैं? वह पचीस आदमी जो कुछ कर सकते हैं, वह तुम्हारे पचीस हजार भी नहीं कर सकते। देखो अम्मां, किसी से कहना मत वर्ना सबसे पहले मेरी जान पर आफ़त आयेगी। मुझे उम्मीद नहीं कि पिकेटिंग और जुलूसों से हमें आजादी हासिल हो सके। यह तो अपनी कमज़ोरी और बेबसी का साफ़ एलान हैं। झंडियां निकालकर और गीत गाकर कौमें नहीं आज़ाद हुआ करतीं। यहां के लोग अपनी अकल से काम नहीं लेते। एक आदमी ने कहा-यों स्वराज्य मिल जाएगा। बस, आंखें बन्द करके उसके पीछे हो लिए। वह आदमी गुमराह है और दूसरों को भी गुमराह कर रहा है। यह लोग दिल में इस ख्याल से खुश हो लें कि हम आज़ादी के करीब आते जाते हैं। मगर मुझे तो काम करने का यह ढंग बिल्कुल खेल-सा मालूम होता है। लड़कों के रोने-धोने और मचलने पर खिलौने और मिठाइयां मिला करती है-वही इन लोगों को मिल जाएगा। असली चीज तो तभी मिलेगी, जब हम उसकी कीमत देने को तैयार होंगे।
मां ने कहा-उसकी कीमत क्या हम नहीं दे रहे हैं? हमारे लाखों आदमी
जेल नहीं गये? हमने डंडे नहीं खाये? हमने अपनी जायदादें नहीं जब्त करायीं?
धर्मवीर-इससे अंग्रेजों को क्या-क्या नुकसान हुआ? वे हिन्दुस्तान उसी वक्त छोड़ेगे, जब उन्हें यकीन हो जाएगा कि अब वे एक पल-भर भी नहीं रह सकते। अगर आज हिन्दोस्तान के एक हजार अंग्रेज कत्ल कर दिए जाएं तो आज ही स्वराज्य मिल जाए। रूस इसी तरह आज़ाद हुआ, आयरलैण्ड भी इसी तरह आज़ाद हुआ, हिन्दोस्तान भी इसी तरह आज़ाद होगा और कोई तरीका नहीं। हमें उनका खात्मा कर देना है। एक गोरे अफसर के कत्ल कर देने से हुकूमत पर जितना डर छा जाता है, उतना एक हजार जुलूसों से मुमकिन नहीं।
मां सर से पांव तक कापं उठी। उसे विधवा हुए दस साल हो गए थे। यही लड़का उसकी जिंदगी का सहारा है। इसी को सीने से लगाए मेहनत-मजदूरी करके अपने मुसीबत के दिन काट रही है। वह इस खयाल से खुश थी कि यह चार पैसे कमायेगा, घर में बहू आएगी, एक टुकड़ा खाऊँगी, और पड़ी रहूँगी। आरजुओं के पतले-पतले तिनकों से उसने ऐ किश्ती बनाई थी। उसी पर बैठकर जिन्दगी के दरिया को पार कर रही थी। वह किश्ती अब उसे लहरों में झकोले खाती हुई मालूम हुई। उसे ऐसा महसूस हुआ कि वह किश्ती दरिया में डूबी जा रही है। उसने अपने सीने पर हाथ रखकर कहा-बेटा, तुम कैसी बातें कर रहे हो। क्या तुम समझते हो, अंग्रेजों को कत्ल कर देने से हम आज़ाद हो जायेंगे? हम अंग्रेजों के दुश्मन नहीं। हम इस राज्य प्रणाली के दुश्मन हैं। अगर यह राज्य-प्रणाली हमारे भाई-बन्दों के ही हाथों में हो-और उसका बहुत बड़ा हिस्सा है भी-तो हम उसका भी इसी तरह विरोध करेंगे। विदेश में तो कोई दूसरी क़ौम राज न करती थी, फिर भी रूस वालों ने उस हुकूमत का उखाड़ फेंका तो उसका कारण यही था कि जार प्रजा की परवाह न करता था। अमीर लोग मज़े उड़ाते थे, गरीबों को पीसा जाता था। यह बातें तुम मुझसे ज्यादा जानते हो। वही हाल हमारा है। देश की सम्पत्ति किसी न किसी बहाने निकलती चली जाती है और हम गरीब होते जाते हैं। हम इस अवैधानिक शासन को बदलना चाहते हैं। मैं तुम्हारे पैरों में पड़ती हूँ, इस सभा से अपना नाम कटवा लो। खामखाह आग़ में न कूदो। मै अपनी आंखों से यह दृश्य नहीं देखना चाहती कि तुम अदालत में खून के जुर्म में लाए जाओ।
धर्मवीर पर इस विनती का कोई असर नहीं हुआ। बोला-इसका कोई डर नहीं। हमने इसके बारे में काफ़ी एहतियात कर ली है। गिरफ्तार होना तो बेवकूफी है। हम लोग ऐसी हिकमत से काम करना चाहते हैं कि कोई गिरफ्तार न हो।
मां के चेहरे पर अब डर की जगह शर्मिंन्दगी की झलक नज़र आयी। बोली-यह तो उससे भी बुरा है। बेगुनाह सज़ा पायें और क़ातिल चैन से बैठे रहें! यह शर्मनाक हरकत है। मैं इसे कमीनापन समझती हूँ। किसी को छिपकर क़त्ल करना दगाबाजी है, मगर अपने बदले बेगुनाह भाइयों को फंसा देना देशद्रोह है। इन बेगुनाहों का खून भी कातिल की गर्दन पर होगा।
धर्मवीर ने अपनी मां की परेशानी का मजा लेते हुए कहा-अम्मां, तुम इन बातों को नहीं समझती। तुम अपने धरने दिए जाओ, जुलूस निकाले जाओ। हम जो कुछ करते हैं, हमें करने दो। गुनाह और सवाब, पाप और पुण्य, धर्म और अर्धम, यह निरर्थक शब्द है। जिस काम का तुम सापेक्ष समझती हो, उसे मैं पुण्य समझता हूँ। तुम्हें कैसे समझाऊँ कि यह सापेक्ष शब्द हैं। तुमने भगवदगीता तो पढ़ी है। कृष्ण भगवान ने साफ़ कहा है-मारने वाला मै हूँ, जिलाने वाला मैं हूँ, आदमी न किसी को मार सकता है, न जिला सकता है। फिर कहां रहा तुम्हारा पाप? मुझे इस बात की क्यों शर्म हो कि मेरे बदले कोई दूसरा मुजरिम करार दिया गया। यह व्यक्तिगत लड़ाई नहीं, इंग्लैण्ड की सामूहिक शक्ति से युद्ध है। मैं मरूं या मेरे बदले कोई दूसरा मरे, इसमें कोई अन्तर नहीं। जो आदमी राष्ट़ की ज्यादा सेवा कर सकता है, उसे जीवित रहने का ज्यादा अधिकार है।
मां आश्चर्य से लड़के का मुहं देखने लगी। उससे बहस करना बेकार था। अपनी दलीलों से वह उसे कायल न कर सकती थी। धर्मवीर खाना खाकर उठ गया। मगर वह ऐसी बैठी रही कि जैसे लक़वा मार गया हो। उसने सोचा-कहीं ऐसा तो नहीं कि वह किसी का क़त्ल कर आया हो। या कत्ल करने जा रहा हो। इस विचार से उसके शरीर के कंपकंपी आ गयी। आम लोगों की तरह हत्या और खून के प्रति घृणा उसके शरीर के कण-कण में भरी हुई थी। उसका अपना बेटा खून करे, इससे ज्यादा लज्जा, अपमान, घृणा की बात उसके लिए और क्या हो सकती थी। वह राष्ट़ सेवा की उस कसौटी पर जान देती थी जो त्याग, सदाचार, सच्चाई और साफ़दिली का वरदान है। उसकी आंखों मे राष्ट़ का सेवक वह था जो नीच से नीच प्राणी का दिल भी न दुखाये, बल्कि जरूरत पड़ने पर खुशी से अपने को बलिदान कर दे। अहिंसा उसकी नैतिक भावनाओं का सबसे प्रधान अंग थी। अगर धर्मवीर किसी गरीब की हिमायत में गोली का निशाना बन जाता तो वह रोती जरूर मगर गर्दन उठाकर। उसे ग़हरा शोक होता, शायद इस शोक में उसकी जान भी चली जाती। मगर इस शोक में गर्व मिला हुआ होता। लेकिन वह किसी का खून कर आये यह एक भयानक पाप था, कलंक था। लड़के को रोके कैसे, यही सवाल उसके सामने था। वह यह नौबत हरगिज न आने देगी कि उसका बेटा खून के जुर्म में पकड़ा न जाये। उसे यह बरदाश्त था कि उसके जुर्म की सजा बेगुनाहों को मिले। उसे ताज्जुब हो रहा था, लड़के मे यह पागलपन आया क्योंकर? वह खाना खाने बैठी मगर कौर गले से नीचे न जा सका। कोई जालिम हाथ धर्मवीर को उनकी गोद से छीन लेता है। वह उस हाथ को हटा देना चाहती थी। अपने जिगर के टुकड़े को वह एक क्षण के लिए भी अलग न करेगी। छाया की तरह उसके पीछे-पीछे रहेगी। किसकी मजाल है जो उस लड़के को उसकी गोद से छीने!
धर्मवीर बाहर के कमरे में सोया करता था। उसे ऐसा लगा कि कहीं वह न चला गया हो। फौरन उसके कमरे में आयी। धर्मवीर के सामने दीवट पर दिया जल रहा था। वह एक किताब खोले पढ़ता-पढ़ता सो गया था। किताब उसके सीने पर पड़ी थी। मां ने वहीं बैठकर अनाथ की तरह बड़ी सच्चाई और विनय के साथ परमात्मा से प्रार्थना की कि लड़के का हृदय-परिवर्तन कर दे। उसके चेहरे पर अब भी वहीं भोलापन, वही मासूमियत थी जो पन्द्रह-बीस साल पहले नज़र आती थी। कर्कशता या कठोरता का कोई चिहृन न था। मां की सिद्धांतपरता एक क्षण के लिए ममता के आंचल में छिप गई। मां ने हृदय से बेटे की हार्दिक भावनाओं को देखा। इस नौजवान के दिल में सेवा की कितनी उंमग है, कोम का कितना दर्द हैं, पीड़ितों से कितनी सहानुभूति हैं अगर इसमे बूढ़ों की-सी सूझ-बूझ, धीमी चाल और धैर्य है तो इसका क्या कारण है। जो व्यक्ति प्राण जैसी प्रिय वस्तु को बलिदान करने के लिए तत्पर हो, उसकी तड़प और जलन का कौन अन्दाजा कर सकता है। काश यह जोश, यह दर्द हिंसा के पंजे से निकल सकता तो जागरण की प्रगति कितनी तेज हो जाती!
मां की आहट पाकर धर्मवीर चौंक पड़ा और किताब संभालता हुआ बोला-तुम कब आ गयीं अम्मां? मुझे तो जाने कब नींद आ गयी।
मॉँ ने दीवट को दूर हटाकर कहा-चारपाई के पास दिया रखकर न सोया करो। इससे कभी-कभी दुर्घटनाएं हो जाया करती हैं। और क्या सारी रात पढ़ते ही रहोगे? आधी रात तो हुई, आराम से सो जाओ। मैं भी यहीं लेटी जाती हूँ। मुझे अन्दर न जाने क्यों डर लगता है।
धर्मवीर-तो मैं एक चारपाई लाकर डाले देता हूँ।
‘नहीं, मैं यहीं जमीन पर लेट जाती हूँ।’
‘वाह, मैं चारपाई पर लेटूँ और तू जमीन पर पड़ी रहो। तुम चारपाई पर आ जाओ।’
‘चल, मैं चारपाई पर लेटूं और तू जमीन पर पड़ा रहे यह तो नहीं हो सकता।’
‘मैं चारपाई लिये आता हूँ। नहीं तो मैं भी अन्दर ही लेटता हूँ। आज आप डरीं क्यों?’
‘तुम्हारी बातों ने डरा दिया। तू मुझे भी क्यों अपनी सभा में नहीं सरीक कर लेता?’
धर्मवीर ने कोई जवाब नहीं दिया। बिस्तर और चारपाई उठाकर अन्दर वाले कमरे में चला। मॉँ आगे-आगे चिराग दिखाती हुई चली। कमरे में चारपाई डालकर उस पर लेटता हुआ बोला-अगर मेरी सभा में शरीक हो जाओ तो क्या पूछना। बेचारे कच्ची-कच्ची रोटियां खाकर बीमार हो रहे हैं। उन्हें अच्छा खाना मिलने लगेगा। फिर ऐसी कितनी ही बातें हैं जिन्हें एक बूढ़ी स्त्री जितनी आसानी से कर सकती है, नौजवान हरगिज़ नहीं कर सकते। मसलन, किसी मामले का सुराग लगाना, औरतों में हमारे विचारों का प्रचार करना। मगर तुम दिल्लगी कर रही हो!
मां ने गभ्भीरता से कहा-नहीं बेटा दिल्लगी नहीं कर रही। दिल से कह रही हूँ। मां का दिल कितना नाजुक होता है, इसका अन्दाजा तुम नहीं कर सकते। तुम्हें इतने बड़े खतरे में अकेला छोड़कर मैं घर नहीं बैठ सकती। जब तक मुझे कुछ नहीं मालूम था, दूसरी बात थी। लेकिन अब यह बातें जान लेने के बाद मैं तुमसे अलग नहीं रह सकती। मैं हमेशा तुम्हारे बग़ल में रहूँगी और अगर कोई ऐसा मौक़ा आया तो तुमसे पहले मैं अपने को कुर्बान करूँगी। मरते वक्त तुम मेरे सामने होगे। मेरे लिए यही सबसे बड़ी खुशी है। यह मत समझो कि मैं नाजुक मौक़ों पर डर जाऊंगी, चीखूंगी, चिल्लाऊंगी, हरगिज नहीं। सख्त से सख्त खतरों के सामने भी तुम मेरी जबान से एक चीख न सुनोगे। अपने बच्चे की हिफाज़त के लिए गाय भी शेरनी बन जाती है।
धर्मवीर ने भक्ति से विहृल होकर मां के पैरों को चूम लिया। उसकी दृष्टि में वह कभी इतने आदर और स्नेह के योग्य न थी।

2

दूसरे ही दिन परीक्षा का अवसर उपस्थित हुआ। यह दो दिन बुढ़िया ने रिवाल्वर चलाने के अभ्यास में खर्च किये। पटाखे की आवाज़ पर कानों पर हाथ रखने वाली, अहिंसा और धर्म की देवी, इतने साहस से रिवाल्वर चलाती थी और उसका निशाना इतना अचूक होता था कि सभा के नौजवानों को भी हैरत होती थी।
पुलिस के सबसे बड़े अफ़सर के नाम मौत का परवाना निकला और यह काम धर्मवीर के सुपुर्द हुआ।
दोनों घर पहुँचे तो मां ने पूछा-क्यों बेटा, इस अफ़सर ने तो कोई ऐसा काम नहीं किया फिर सभा ने क्यों उसको चुना?
धर्मवीर मां की सरलता पर मुस्कराकर बोला-तुम समझती हो हमारी कांस्टेबिल और सब-इंस्पेक्टर और सुपरिण्टेण्डैण्ट जो कुछ करते हैं, अपनी खुशी से करते हैं? वे लोग जितने अत्याचार करते हैं, उनके यही आदमी जिम्मेदार हैं। और फिर हमारे लिए तो इतना ही काफ़ी है कि वह उस मशीन का एक खास पुर्जा है जो हमारे राष्ट्र को चरम निर्दयता से बर्बाद कर रही है। लड़ाई में व्यक्तिगत बातों से कोई प्रयोजन नहीं, वहां तो विरोध पक्ष का सदस्य होना ही सबसे बड़ा अपराध है।
मां चुप हो गयी। क्षण-भर बाद डरते-डरते बोली-बेटा, मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं मांगा। अब एक सवाल करती हूँ, उसे पूरा करोगे?
धर्मवीर ने कहा-यह पूछने की कोई जरूरत नहीं अम्मा, तुम जानती हो मैं तुम्हारे किसी हुक्म से इन्कार नहीं कर सकता।
मां-हां बेटा, यह जानती हूँ। इसी वजह से मुझे यह सवाल करने की हिम्मत हुई। तुम इस सभा से अलग हो जाओ। देखो, तुम्हारी बूढ़ी मां हाथ जोड़कर तुमसे यह भीख मांग रही है।
और वह हाथ जोड़कर भिखारिन की तरह बेटे के सामने खड़ी हो गयी। धर्मवीर ने क़हक़हा मारकर कहा-यह तो तुमने बेढब सवाल किया, अम्मां। तुम जानती हो इसका नतीजा क्या होगा? जिन्दा लौटकर न आऊँगा। अगर यहां से कहीं भाग जाऊं तो भी जान नहीं बच सकती। सभा के सब मेम्बर ही मेरे खून के प्यासे हो जायेंगे और मुझे उनकी गोलियों का निशाना बनना पड़ेगा। तुमने मुझे यह जीवन दिया है, इसे तुम्हारे चरणों पर अर्पित कर सकता हूँ। लेकिन भारतमाता ने तुम्हें और मुझे दोनों ही को जीवन दिया है और उसका हक सबसे बड़ा है। अगर कोई ऐसा मौक़ा हाथ आ जाय कि मुझे भारतमाता की सेवा के लिए तुम्हें कत्ल करना पड़े तो मैं इस अप्रिय कर्त्तव्य से भी मुहं न मोड़ सकूंगा। आंखों से आंसू जारी होंगे, लेकिन तलवार तुम्हारी गर्दन पर होगी। हमारे धर्म में राष्ट्र की तुलना में कोई दूसरी चीज नहीं ठहर सकती। इसलिए सभा को छोड़ने का तो सवाल ही नहीं है। हां, तुम्हें डर लगता हो तो मेरे साथ न जाओ। मैं कोई बहाना कर दूंगा और किसी दूसरे कामरेड को साथ ले लूंगा। अगर तुम्हारे दिल में कमज़ोरी हो, तो फ़ौरन बतला दो।
मां ने कलेजा मजबूत करके कहा-मैंने तुम्हारे ख्याल से कहा था भइया, वर्ना मुझे क्या डर।
अंधेरी रात के पर्दें में इस काम को पूरा करने का फैसला किया गया था। कोप का पात्र रात को क्लब से जिस वक्त लौटे वहीं उसकी जिन्दगी का चिराग़ बुझा दिया जाय। धर्मवीर ने दोपहर ही को इस मौके का मुआइना कर लिया और उस खास जगह को चुन लिया जहां से निशाना मारेगा। साहब के बंगले के पास करील और करौंदे की एक छोटी-सी झाड़ी थी। वही उसकी छिपने की जगह होगी। झाड़ी के बायीं तरफ़ नीची ज़मीन थी। उसमें बेर और अमरूद के बाग़ थे। भाग निकलने का अच्छा मौक़ा था।
साहब के क्लब जाने का वक्त सात और आठ बजे के बीच था, लौटने का वक्त ग्यारह बजे था। इन दोनों वक्तों की बात पक्की तरह मालूम कर ली गयी थी। धर्मवीर ने तय किया कि नौ बजे चलकर उसी करौंदेवाली झाड़ी में छिपकर बैठ जाय। वहीं एक मोड़ भी था। मोड़ पर मोटर की चाल कुछ धीमी पड़ जायेगी। ठीक इसी वक्त उसे रिवाल्वर का निशाना बना लिया जाय।
ज्यों-ज्यों दिन गुजरता जाता था, बूढ़ी मां का दिल भय से सूखता जाता था। लेकिन धर्मवीर के दैनंदिन आचरण में तनिक भी अन्तर न था। वह नियत समय पर उठा, नाश्ता किया, सन्ध्या की और अन्य दिनों की तरह कुछ देर पढ़ता रहा। दो-चार मित्र आ गये। उनके साथ दो-तीन बाज़ियां शतरंज की खेलीं। इत्मीनान से खाना खाया और अन्य् दिनों से कुछ अधिक। फिर आराम से सो गया, कि जैसे उसे कोई चिन्ता नहीं है। मां का दिल उचाट था। खाने-पीने का तो जिक्र ही क्या, वह मन मारकर एक जगह बैठ भी न सकती थी। पड़ोस की औरतें हमेशा की तरह आयीं। वह किसी से कुछ न बोली। बदहवास-सी इधर-उधर दौड़ती फिरती थीं कि जैसे चुहिया बिल्ली के डर से सुराख ढूंढ़ती हो। कोई पहाड़-सा उसके सिर पर गिरता था। उसे कहीं मुक्ति नहीं। कहीं भाग जाय, ऐसी जगह नहीं। वे घिसे-पिटे दार्शनिक विचार जिनसे अब तक उसे सान्तवना मिलती थी-भाग्य, पुनर्जन्म, भगवान की मर्जी-वे सब इस भयानक विपत्ति के सामने व्यर्थ जान पड़ते थे। जिरहबख्तर और लोहे की टोपी तीर-तुपक से रक्षा कर सकते हैं लेकिन पहाड़ तो उसे उन सब चीजों के साथ कुचल डालेगा। उसके दिलो-दिमाग बेकार होते जाते थे। अगर कोई भाव शेष था, तो वह भय था। मगर शाम होते-होते उसके हृदय पर एक शन्ति-सी छा गयी। उसके अन्दर एक ताकत पैदा हुई जिसे मजबूरी की ताक़त कह सकते हैं। चिड़िया उस वक्त तक फड़फड़ाती रही, जब तक उड़ निकलने की उम्मीद थी। उसके बाद वह बहेलिये के पंजे और क़साई के छुरे के लिए तैयार हो गयी। भय की चरम सीमा साहस है।
उसने धर्मवीर को पुकारा-बेटा, कुछ आकर खा लो।
धर्मवीर अन्दर आया। आज दिन-भर मां-बेटे में एक बात भी न हुई थी। इस वक्त मां ने धर्मवीर को देखा तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। वह संयम जिससे आज उसने दिन-भर अपने भीतर की बेचैनी को छिपा रखा था, जो अब तक उड़े-उड़े से दिमाग की शकल में दिखायी दे रही थी, खतरे के पास आ जाने पर पिघल गया था-जैसे कोई बच्चा भालू को दूर से देखकर तो खुशी से तालियां बजाये लेकिन उसके पास आने पर चीख उठे।
दोनों ने एक दूसरे की तरफ़ देखा। दोनों रोने लगे।
मां का दिल खुशी से खिल उठा। उसने आंचल से धर्मवीर के आंसू पोंछते हुए कहा-चलो बेटा, यहां से कहीं भाग चलें।
धर्मवीर चिन्ता-मग्न खड़ा था। मां ने फिर कहा-किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं। यहां से बाहर निकल जायं जिसमें किसी को खबर भी न हो। राष्ट्र की सेवा करने के और भी बहुत-से रास्ते हैं।
धर्मवीर जैसे नींद से जागा, बोला-यह नहीं हो सकता अम्मां। कर्त्तव्य तो कर्त्तव्य है, उसे पूरा करना पड़ेगा। चाहे रोकर पूरा करो, चाहे हसंकर। हां, इस ख्याल से डर लगता है कि नतीजा न जाने क्या हो। मुमकिन है निशाना चूक जाये और गिरफ्तार हो जाऊं या उसकी गोली का निशाना बनूं। लेकिन खैर, जो हो, सो हो। मर भी जायेंगे तो नाम तो छोड़ जाएंगे।
क्षण-भर बाद उसने फिर कहा-इस समय तो कुछ खाने को जी नहीं चाहता, मां। अब तैयारी करनी चाहिए। तुम्हारा जी न चाहता हो तो न चलो, मैं अकेला चला जाऊंगा।
मां ने शिकायत के स्वर में कहा-मुझे अपनी जान इतनी प्यारी नहीं है बेटा, मेरी जान तो तुम हो। तुम्हें देखकर जीती थी। तुम्हें छोड़कर मेरी जिन्दगी और मौत दोनों बराबर हैं, बल्कि मौत जिन्दगी से अच्छी है।
धर्मवीर ने कुछ जवाब न दिया। दोनों अपनी-अपनी तैयारियों में लग गये। मां की तैयारी ही क्या थी। एक बार ईश्वर का ध्यान किया, रिवाल्वर लिया और चलने को तैयार हो गयी।
धर्मवीर का अपनी डायर लिखनी थी। वह डायरी लिखने बैठा तो भावनाओं का एक सागर-सा उमड़ पड़ा। यह प्रवाह, विचारों की यह स्वत: स्फूर्ति उसके लिए नयी चीज थी। जैसे दिल में कहीं सोता खुल गया हो। इन्सान लाफ़ानी है, अमर है, यही उस विचार-प्रवाह का विषय था। आरभ्भ एक दर्दनाक अलविदा से हुआ-
‘रुखसत! ऐ दुनिया की दिलचस्पियों, रुखस्त! ऐ जिन्दगी की बहारो, रुखसत! ऐ मीठे जख्मों, रुखसत! देशभाइयों, अपने इस आहत और अभागे सेवक के लिए भगवान से प्रार्थना करना! जिन्दगी बहुत प्यारी चीज़ है, इसका तजुर्बा हुआ। आह! वही दुख-दर्द के नश्तर, वही हसरतें और मायूसियां जिन्होंने जिंदगी को कडुवा बना रखा था, इस समय जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। यह प्रभात की सुनहरी किरनों की वर्षा, यह शाम की रंगीन हवाएं, यह गली-कूचे, यह दरो-दीवार फिर देखने को मिलेंगे। जिन्दगी बन्दिशों का नाम है। बन्दिशें एक-एक करके टूट रही हैं। जिन्दगी का शीराज़ा बिखरा जा रहा है। ऐ दिल की आज़ादी! आओ तुम्हें नाउम्मीदी की कब्र में दफ़न कर दूँ। भगवान् से यही प्रार्थना है कि मेरे देशवासी फलें-फूलें, मेरा देश लहलहाये। कोई बात नहीं, हम क्या और हमारी हस्ती ही क्या, मगर गुलशन बुलबुलों से खाली न रहेगा। मेरी अपने भाइयों से इतनी ही विनती है कि जिस समय आप आजादी के गीत गायें तो इस ग़रीब की भलाई से लिए दुआ करके उसे याद कर लें।’
डायरी बन्द करके उसने एक लम्बी सांस खींची और उठ खड़ा हुआ। कपड़े पहनेख् रिवाल्वर जेब में रखा और बोला-अब तो वक्त हो गया अम्मां!
मां ने कुछ जवाब न दिया। घर सम्हालने की किसे परवाह थी, जो चीज़ जहां पड़ी थी, वहीं पड़ी रही। यहां तक कि दिया भी न बुझाया गया। दोनों खामोश घर से निकले।–एक मर्दानगी के साथ क़दम उठाता, दूसरी चिन्तित और शोक-मग्न और बेबसी के बोझ से झुकी हुई। रास्ते में भी शब्दों का विनिमय न हुआ। दोनों भाग्य-लिपि की तरह अटल, मौन और तत्पर थे-गद्यांश तेजस्वी, बलवान् पुनीत कर्म की प्रेरणा, पद्यांश दर्द, आवेश और विनती से कांपता हुआ।
झाड़ी में पहुँचकर दोनों चुपचाप बैठ गये। कोई आध घण्टे के बाद साहब की मोटर निकली। धर्मवीर ने गौर से देखा। मोटर की चाल धीमी थी। साहब और लेडी बैठे थे। निशाना अचूक था। धर्मवीर ने जेब से रिवाल्वर निकाला। मां ने उसका हाथ पकड़ लिया और मोटर आगे निकल आयी।
धर्मवीर ने कहा-यह तुमने क्या किया अम्मां! ऐसा सुनहरा मौक़ा फिर हाथ न आयेगा।
मां ने कहा-मोटर में मेम भी थी। कहीं मेम को गोली लग जाती तो?
‘तो क्या बात थी। हमारे धर्म में नाग, नागिन और सपोले में कोई भी अन्तर नहीं।’
मां ने घृणा भरे स्वर में कहा-तो तुम्हारा धर्म जंगली जानवरों और वहशियों का है, जो लड़ाई के बुनियादी उसूलों की भी परवाह नहीं करता। स्त्री हर एक धर्म में निर्दोष समझी गयी है। यहां तक कि वहशी भी उसका आदर करते हैं।
‘वापसी के समय हरगिज न छोडूंगा।’
‘मेरे जीते-जी तुम स्त्री पर हाथ नहीं उठा सकते।’
‘मैं इस मामले मे तुम्हारी पाबन्दियों का गुलाम नहीं हो सकता।’
मां ने कुछ जवाब न दिया। इस नामर्दों जैसी बात से उसकी ममता टुकड़े-टुकड़े हो गयी। मुश्किल से बीस मिनट बीते होंगे कि वहीं मोटर दूसरी तरफ़ से आती दिखायी पड़ी। धर्मवीर ने मोटर को गौर से देखा और उछलकर बोला- लो अम्मां, अबकी बार साहब अकेला है। तुम भी मेरे साथ निशाना लगाना।
मां ने लपककर धर्मवीर का हाथ पकड़ लिया और पागलों की तरह जोर लगाकर उसका रिवाल्वर छीनने लगा। धर्मवीर ने उसको एक धक्का देकर गिरा दिया और एक कदम रिवाल्वर साधा। एक सेकेण्ड में मां उठी। उसी वक्त गोली चली। मोटर आगे निकल गयी, मगर मां जमीन पर तड़प रही थी।
धर्मवीर रिवाल्वर फेंककर मां के पास गया और घबराकर बोला-अम्मां, क्या हुआ? फिर यकायक इस शोकभरी घटना की प्रतीति उसके अन्दर चमक उठी-वह अपनी प्यारी मां का कातिल है। उसके स्वभाव की सारी कठोरता और तेजी और गर्मी बुझ गयी। आंसुओं की बढ़ती हुई थरथरी को अनुभव करता हुआ वह नीचे झुका, और मां के चेहरे की तरफ आंसुओं में लिपटी हुई शर्मिंन्दगी से देखकर बोला-यह क्या हो गया अम्मां! हाय, तुम कुछ बोलतीं क्यों नहीं! यह कैसे हो गया। अंधेरे में कुछ नज़र भी तो नहीं आता। कहॉँ गोली लगी, कुछ तो बताओ। आह! इस बदनसीब के हाथों तुम्हारी मौत लिखी थी। जिसको तुमने गोद में पाला उसी ने तुम्हारा खून किया। किसको बुलाऊँ, कोई नजर भी तो नहीं आता।
मां ने डूबती हुई आवाज में कहा-मेरा जन्म सफल हो गया बेटा। तुम्हारे हाथों मेरी मिट्टी उठेगी। तुम्हारी गोद में मर रही हूँ। छाती में घाव लगा है। ज्यों तुमने गोली चलायी, मैं तुम्हारे सामने खड़ी हो गयी। अब नहीं बोला जाता, परमात्मा तुम्हें खुश रखे। मेरी यही दुआ है। मैं और क्या करती बेटा। मॉँ की आबरू तुम्हारे हाथ में है। मैं तो चली।
क्षण-भर बाद उस अंधेरे सन्नाटे में धर्मवीर अपनी प्यारी मॉँ के नीमजान शरीर को गोद में लिये घर चला तो उसके ठंडे तलुओं से अपनी ऑंसू-भरी ऑंखें रगड़कर आत्मिक आह्लाद से भरी हुई दर्द की टीस अनुभव कर रहा था।