Friday, August 7, 2009

pyar ki kahani

5 comments:

  1. किसी से खीच कर रहे, किसी को टूट कर चाहा
    दुखों की राहतें झेली, खुशी के दर्द सहे,
    कभी बगूला से भटके, कभी नदी से बहे
    कही अँधेरा, कही रौशनी, कही साया
    तरह-तरह के फरेबों का जाल फैलाया
    पहाड़ सख्त था बरसों में रेत हो पाया

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  2. रात भर सर्द हवा चलती रही
    रात भर हमने अलाव तापा
    मैंने मर्जी से कई खुश्क सी शाखें काटीं
    तुमने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े,
    मैंने जेबों से निकाले सभी सूखी नज्में
    तुमने भी हाथों से मुरझाये हुए ख़त खोले
    अपने इन आखों से मैंने कई मंज़र तोड़े
    ...और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
    तुम्हारे पलकों पे नमी सूख गयी थी, सो गिरा दिया
    रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
    काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे
    रात भर फूकों से हर लौ को जलाये रखा
    और दो जिस्मों के इंधन को जलाये रखा

    ...रात भर बुझते हुए रिश्तों को तापा हमने.

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  3. एक ऐसा शख्स जो, मोहब्बत-ओ-वफ़ा करे
    उठाए हाथ जब भी वो, मेरे लिए दुआ करे

    अकेले बैठूं जो कभी मैं, खुद को सोचती हुई
    तो आँखें मूंद के मेरी, वो पीछे से हंसा करे


    मुझे बताए ग़लतियाँ भी, रास्ता दिखाए फिर
    वो देखे बन के आइना, हरेक पल खुदा करे

    हूँ जो खफा मनाए, करके भोली सी शरारतें
    जो खिलखिला के हंस पढ़ुँ, तो एकटक तका करे

    हो पूरे ख्वाब कब, नहीं ये “श्रद्धा” जानती मगर
    कज़ा से पहले चार दिन, खुशी के रब अता करे
    RINKU BABA

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  4. तुम्हारे बिखरे से बाल,
    जिन को अनायास सवांरते समय
    तुम देख लेते थे, कनखियों से मुझे...
    और शरारत से होंठों पर आई मुस्कान को दबा
    सहजता का आवरण ओढ लेते...

    तुम्हारे बिखरे से बाल,
    जिन पर जब कभी फेरी मैंने अपनी उँगलियाँ
    तो सिहर उठता तुम्हारा पूरा बदन
    तुम्हारा मन् अकुला जाता,
    एक छोटे बच्चे की तरह
    मेरे सीने में छुप जाने को,
    पर तभी, तुम भावनाओं को,
    विवेक के पाश में बांध
    हो जाते मौन, असहज होते हुए भी
    सहजता का आवरण ओढ लेते ...

    मुझे अच्छा लगता है यूँ तुम्हारा सहज होना
    और अच्छे लगते हैं तुम्हारे बिखरे से बाल

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