
बिहार के सारण जिले में छपरा शहर से लगभग दस किलोमीटर पूर्व में चिरान नामक स्थान के पास कुतुबपुर गांव में भिखारी ठाकुर का जन्म पौष मास शुक्ल पंचमी संवत् 1944 तद्नुसार 18 दिसंबर, 1887 (सोमवार) को दोपहर बारह बजे शिवकली देवी और दलसिंगार ठाकुर के घर हुआ था ।
आज भी अपनी दीन-हीन दशा पर आंसू बहाता खडा है कुतुबपुर गांव, जो कभी भोजपुर (शाहाबाद) जिले में था, पर अब गंगा की कटान को झेलता सारण (छपरा) जिले में आ गया है। इसी गांव के पूर्वी छोर पर स्थित है भिखारी ठाकुर का पुश्तैनी, कच्चा, पुराना, खपरैल का मकान।
अपने मां-बाप की ज्येष्ठ संतान भिखारी ने नौ वर्ष की अवस्था में पढाई शुरू की। एक वर्ष तक तो कुछ भी न सीख सके। साथ में छोटे भाई थे बहोर ठाकुर। बाद में गुरु भगवान से उन्होंने ककहरा सीखा और स्कूली शिक्षा अक्षर-ज्ञान तक ही सीमित रही। बस, किसी तरह टो-टाकर वह रामचरित मानस पढ लेते थे। वह कैथी लिपि में ही लिखते थे, जिसे दूसरों के लिए पढ पाना मुश्किल होता था। पर लेखन की मौलिक प्रतिभा तो उनमें जन्मजात थी। इस प्रकार, शिक्षा में वह कबीर की श्रेणी में आते हैं।
किशोरावस्था में ही उनका विवाह मतुरना के साथ हो गया। लुक-छिपकर वह नाच देखने चले जाते थे और नृत्य-मंडलियों में छोटी-मोटी भूमिकाएं भी अदा करने लगे थे। पर मां-बाप को यह कतई पसंद न था। फिर तो एक रोज गांव से भागकर वह खडगपुर जा पहुंचे। मेदिनीपुर जिले की रामलीला और जगन्नाथपुरी की रथयात्रा देख उनके भीतर का सोया हुआ कलाकार पुन: जाग उठा और गांव लौटे तो कलात्मक प्रतिभा और धार्मिक भावनाओं से पूरी तरह लैस होकर। तीस वर्ष की उम्र में उन्होंने विदेसिया की रचना की। फिर तो उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा। परिवार के विरोध के बावजूद नृत्यमंडली का गठन कर वह शोहरत की बुलंदियों को छूने लगे। जन-जन की जुबान पर बस एक ही नाम-भिखारी ठाकुर! कलाकारों के कलाकार-मल्लिक जी!
वर्ष 1938 से 1962 के मध्य भिखारी ठाकुर की लगभग तीन दर्जन पुस्तिकाएं छपीं, जिन्हें फुटपाथों से खरीदकर लोग चाव से पढा करते थे। अधिकांश पुस्तिकाएं दूधनाथ प्रेस, सलकिया (हावडा) और कचौडी गली (वाराणसी) से प्रकाशित हुई थीं। नाटकों व रूपकों में बहरा बहार (विदेशिया), कलियुग प्रेम (पियवा नसइल), गंगा-स्नान, बेटी वियोग (बेटी बेचवा), भाई विरोध, पुत्र-बधु, विधवा-विलाप, राधेश्याम बहार, ननद-भौज्जाई, गबरघिंचोर आदि मुख्य हैं। लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम, कुतुबपुर ने 1979 और 1986 में भिखारी ठाकुर ग्रंथावली के पहले तथा दूसरे खंड का प्रकाशन किया था और अब संपूर्ण रचनावली एक जिल्द में ही बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् से प्रकाशित हो चुकी है। समालोचक महेश्वराचार्य ने जहां पहले 1964 में जनकवि भिखारी ठाकुर, फिर 1978 में परिविर्द्धत संस्करण भिखारी की रचना की, वहीं इन पंक्तियों के लेखक ने समालोचनात्मक मोनोग्राफ लिखा। प्रख्यात कथाकार संजीव ने भी भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित सूत्रधार उपन्यास की रचना की है। मगर आलोचना-समालोचना से परे सादा जीवन, उच्च विचार की जीवंत प्रतिमूर्ति थे मल्लिक जी। रोटी, भात, सत्तू-जो भी मिल जाता, ईश्वर का प्रसाद मानकर प्रेमपूर्वक खाते थे। भोजन के बाद गुड भी। बिना किनारी की धोती, छह गज की मिरजई, सिर पर साफा और पैरों में जूता उनका पहनावा था। उनकी दिली तमन्ना भी थी-सदा भिखारी रहसु भिखारी!
10 जुलाई, 1971 (शनिवार) को चौरासी वर्ष की अवस्था में उनका निधन हुआ था। राय बहादुर का खिताब, बिहार सरकार से ताम्रपत्र, जिलाधिकारी (भोजपुर) से शील्ड, विदेसिया फिल्म से प्रसिद्धि और जनता में अभूतपूर्व लोकप्रियता मिलने के बाद भी आजीवन कोई अहम् भाव नहीं। दरवाजे के सामने जमीन पर चटाई बिछाकर बैठे रहते, अपने आपको सबसे छोटा आदमी मानकर चलते और उम्र में छोटा हो या बडा, सबका हाथ जोडकर ही अभिवादन किया करते थे। महापंडित राहुल जी ने भिखारी को जहां भोजपुरी का शेक्सपियर व अनगढ हीरा कहा था, वहीं जगदीशचंद्र माथुर ने उन्हें भरतमुनि की परंपरा का (प्रथम) लोकनाटककार माना था। मगर समीक्षक रामनिहाल गुंजन का मानना है-भिखारी अपने रूढिमुक्त और प्रगतिशील सामाजिक दृष्टिकोण के चलते भारतेंदु के ज्यादा करीब हैं, इसलिए उन्हें भोजपुरी का भारतेंदु हरिश्चंद्र कहना ज्यादा उपयुक्त होगा। इसी अर्थ में उनका उचित मूल्यांकन भी करना संभव होगा।
भिखारी ने भोजपुरी को अभूतपूर्व ऊंचाई, गहराई व विस्तार दिया। खांटी माटी और जनजीवन से गहरे जुडा उनका साहित्य जनसामान्य का कंठहार बन गया तथा भोजपुरी व भिखारी-दोनों एक-दूसरे के पूरक-से हो गए। अपनी नृत्यमंडली के माध्यम से भिखारी धूमकेतु की तरह छा गए और ज्यों-ज्यों वक्त गुजरता जा रहा है, भिखारी के व्यक्तित्व-कृतित्व की चमक और बढती जा रही है। मगर आज भी उनका और उनके सृजन का सार्थक मूल्यांकन होना शेष है।
गोस्वामी तुलसीदास व कबीर की तरह यदि लोकभाषा के किसी कवि-कलाकार को संपूर्ण उत्तर भारत के जन-जन में प्रचंड लोकप्रियता मिली, तो वह थे भिखारी ठाकुर। भिखारी का अभ्युदय उस समय हुआ, जब देश की आम जनता विदेशियों की त्रासद दासता झेलने के साथ ही अज्ञानता, सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास व रूढियों की बेडियों में बुरी तरह जकडी हुई थी। सर्वाधिक बुरी स्थिति नारियों की थी, जो खूंटे से बंधी गाय की तरह बाल विवाह, बेमेल विवाह का शिकार हो, विधवा का जीवन जीने के लिए अभिशप्त थीं। भिखारी ने अत्यंत निर्धन परिवार में जन्म लेकर न सिर्फ समाज के दबे-कुचले वर्ग का प्रतिनिधित्व किया, बल्कि मुख्य रूप से आधी आबादी की बदहाली को ही अपनी सृजनधर्मिता का विषय बनाया। वह लोकभाषा की अकूत क्षमता से बखूबी परिचित थे, तभी तो निरक्षर होने के बावजूद जन-जन तक पहुंचने के लिए उन्होंने अपनी मातृभाषा भोजपुरी में न केवल सबसे पहले लोक नाटकों का प्रभावोत्पादक प्रणयन व मंच-प्रस्तुति की, वरन लोकशैली विदेसिया के प्रवर्तक के रूप में भी प्रख्यात हुए। लोकनाटककार, जनकवि, अभिनेता, निर्देशक, सूत्रधार आदि अनेक मौलिक गुणों से संपन्न भिखारी सबसे पहले मनुष्य थे-मनुष्यता की कसौटी पर खरे उतरने वाले अप्रतिम कलाकार।



